स्वस्तिक से होता है घर में मांगलिक कार्यों का प्रवेश।
क्या है स्वास्तिक बनाने के नियम
स्वस्तिक का प्रतीक भारत में आदि काल से प्रचलित है। इसका उल्लेख वेदों में भी मिलता है। सिंधुघाटी की सभ्यता की खुदाई में भी जो मोहरे मिली है उनमें स्वस्तिक के प्रतीक की मोहरे भी हैं, जो कि इस बात का प्रमाण है कि स्वस्तिक से हमारा नाता बहुत प्राचीन काल से है। इसके अलावा विदेशों में स्वस्तिक के प्रतीक को पर्याप्त महत्व दिया गया है। पश्चिम में कुछ सभ्यताओं की खुदाई में स्वस्तिक के प्रतीक के उपयोग के प्रमाण मिले हैं।
एक स्वस्तिक हजार दोषों को दूर करने की क्षमता रखता है
जिस प्रकार से आंवला हजार रोगों की दवा है उसी तरह से स्वस्तिक भी हजार दोषों को दूर करने की क्षमता रखता है। विशेष रूप से स्वस्तिक सगाई-विवाह में देरी, घर में मानसिक तनाव, बुरी आदतें और घर में बरकत नहीं होना जैसी समस्याओं के निराकरण के लिए उपयोग किया जाता है। इनके अतिरिक्त भी घर या व्यावसायिक स्थान पर स्वस्तिक का होना अनेक प्रकार की समस्याओं के निराकरण के लिए रामबाण है। यदि किसी का बिजनेस धीरे चल रहा है तो वह स्वस्तिक के प्रतीक का अंकन करके बिजनेस की गतिशीतला में वृद्धि कर सकता है।
स्वस्तिक का अंकन कैसे करना चाहिए।
स्वस्तिक एक ऐसा आध्यात्मिक चिह्न है जो स्वयं में अद्भुत शक्तियाँ समाहित किए हुए है। जिस प्रकार से हम इसे उकेरते है उसी भाव से यह हमें परिणाम देता है। सामान्य मांगलिक कार्य के लिए स्वस्तिक को अष्टगंध, हल्दी, कुंकुम या फिर सिन्दूर से उकेरना चाहिए। घर के अंदर ज्यादा से ज्यादा 4 इंच का स्वस्तिक बनाएँ। मुख्य द्वार के दोनों तरफ यदि स्वस्तिक बनाएँ तो वह ज्यादा से ज्यादा 6 इंच का होना चाहिए। विशेष सफलता प्राप्त करने के लिए संभव हो तो स्वस्तिक को हमेशा गुरुवार या शुक्रवार को उकेरना चाहिए। स्वस्तिक को हमेशा अनामिका अंगुली से बनाया जाना चाहिए।
विशेष अवसरों के अतिरिक्त स्वस्तिक को हमेशा जमीन से 3 फीट से अधिक ऊंचा होना चाहिए। यदि रंगों के प्रयोग से स्वस्तिक निर्मित करना हो तो लाल रंग का अधिकतम इस्तेमाल होना चाहिए। सजावट के लिए पीला और केसरिया काम में ले सकते हैं। काले रंग का प्रयोग स्वस्तिक बनाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
कुछ तथाकथित वास्तु-शास्त्री नींव में स्वस्तिक के प्रतीक को दबा रहे हैं जो कि बहुत ही मूर्खतापूर्ण है। ऐसा करना आत्मघाती है। स्वस्तिक कभी भी पैरों में नहीं आना चाहिए। क्योंकि स्वस्तिक ब्रह्म का प्रतीक है।
अशुद्ध शरीर या हाथों से स्वस्तिक के प्रतीक का अंकन करना वर्जित है। इससे लाभ के स्थान पर हानि की आशंका हो सकती है।
- ज्योतिर्विद् सत्यनारायण जांगिड़
विदुरजी के मंदिर के पास। रतनगढ़। राजस्थान।