2027 में कब है होली
किस समय होलिका दहन करना शुभ रहेगा
होली परस्पर भाईचारे और रंगों का अद्भुत त्योहार है। जहां तक मुझे जानकारी है इस तरह का रंगों का त्योहार किसी और देश में नहीं है। पूरे विश्व में इस तरह का यह अकेला त्योहार है। किसी जमाने में पूरे फाल्गुन मास में होली के तौर पर हंसी मजाक और मनोरंजन का वातावरण रहता था और होली के अंतिम दिन पूर्णिमा को होलिका दहन और उसके दूसरे दिन रंगों का त्यौहार मनाया जाता था। हालांकि रंगों का यह त्यौहार वर्तमान में अपने स्वरूप में बदलाव के बाद लगभग 2 दिन का उत्सव रह गया है। पहले दिन होलिका दहन होता है और दूसरे दिन एक दूसरे पर रंग लगाकर सभी को होली की शुभकामनाएं दी जाती हैं। वास्तव में यह त्योहार अधर्म पर धर्म की विजय के उपलक्ष्य मनाया जाता है।
अब मैं आपको बताउंगा कि इस त्योहार के पीछे हमारे शास्त्रों में क्या लिखा है और यह त्योहार क्यों मनाया जाता है।
क्या है होलिका की पौराणिक कथा
दरअसल यह कथा सतयुग से जुड़ी हुई है। सतयुग में हिरण्यकश्यप नाम का एक राक्षस राजा था जिसे कई तरह के वरदान मिले हुए थे। जिसके कारण उसे अहंकार हो गया कि वह तो अजेय है और अमर है उसे कोई मार नहीं सकता है। इस अंहकार के कारण वह निरंकुश और निर्दयी हो गया। और उसने अपने नगर में यह घोषणा करवा दी कि वही वास्तविक भगवान है और उसी की पूजा होनी चाहिए। उसके डर से प्रजा उसकी पूजा करने लगी लेकिन उसका स्वयं का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को श्री विष्णु की भक्ति से विमुख करने के लिए अनेक कष्ट और यातनाएं दीं। जब किसी भी तरह से बालक प्रहलाद अपनी भक्ति से विमुख नहीं हुए तो हिरण्यकश्यप ने अपनी समस्या अपनी बहन होलिका से डिसकस किया। कहा जाता है कि होलिका को वरदान के रूप में एक चादर मिली हुई थी जिसको ओढ़ कर बैठने से वह अग्नि से बची रह सकती थी। भाई-बहन ने योजना बनाई कि चादर के कारण होलिका तो बची रहेगी और प्रहलाद जलकर राख हो जायेगा।
अन्ततः योजना अनुसार होलिका ने बालक प्रहलाद को अपनी गोद में बैठा लिया और आग लगा दी गई। लेकिन भगवान श्री विष्णु की भक्ति के कारण आंधी चली और होलिका की चमत्कारी चादर हवा में उड़ गई और होलिका स्वयं जलकर नष्ट हो गई जबकि प्रहलाद सुरक्षित अग्नि से बाहर आ गए। इस घटना के बाद आज भी गोबर से होलिका का प्रतीक बनाकर जलाया जाता है। हालांकि होलिका दहन के संदर्भ में और भी बहुत सी कथाएं हैं लेकिन यह सबसे लोकप्रिय और व्याप्त है।
यह कथा भगवान श्रीविष्णु ने नृसिंह के अवतार के उपरान्त पूर्ण होती है। इसलिए कुछ स्थानों पर भगवान नृसिंह की भी पूजा की जाती है। वैसे मैं अपने प्रिय दर्शकों को एक रहस्य की बात बता दूं कि जो लोग दिमागी रूप से परेशान है। मानसिक परेशानी ज्यादा रहती है। या जिन लोगों को लगता है कि उनमें डिसीजन पावर कम है। और वे जो भी डिसिजन लेते हैं वह गलत हो जाता है। और बाद में पछताना पड़ता है। उनको भी होली के दिन भगवान श्री नृसिंह की पूजा करनी चाहिए।
मुहूर्त कब है
जैसा कि मैं बता चुका हूं कि फाल्गुन पूर्णिमा को होली का त्यौहार मनाया जाता है। अंग्रेजी वर्ष 2027 में 22 मार्च, सोमवार को पूर्णिमा तिथि है। पूर्णिमा तिथि दोपहर बाद 4 बजकर 15 मिनिट तक रहेगी। इस समय भद्रा है। इसलिए होलिका दहन पहले दिन 21 मार्च 2027 को भद्रा की पूंछ में करना चाहिए। होलिका दहन के दूसरे दिन अर्थात 22 मार्च 2027 को रंगों का त्योहार जिसे प्रायः धुल्लंडी कहा जाता है, वह मनाया जायेगा।
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