शनि की दशा में प्राप्त होते हैं पूर्व जन्मों के फल
समाज में शनि ग्रह को एक हौवा बनाया गया है, जब कि सच्चाई यह है कि नवग्रहों मंे शनि ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जो कि जातक को उसके परिश्रम का पूर्ण फल देने में सक्षम है। जितना आप परिश्रम करेंगे शनि उसका तनिक भी कम नहीं देगा। यह अलग बात है कि बिना परिश्रम के शनि से आप को कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ग्रहों में सूर्य, पक्षबलहीन चन्द्रमा, मंगल, राहु और केतु में विध्वंस करने के अवगुण होते हैं। जब कि शनि इन सब से परे हैं। शनि के चरित्र में आपको विध्वंस के लक्षण कभी नहीं दिखाई देंगे। शनि वस्तुस्थिति को लम्बित कर सकते हैं लेकिन उसके परिणाम को पूर्णरूप से नष्ट नहीं करेंगे। आप जिस कार्य क्षेत्र में प्रगतिरत हैं, उस कार्य पर यदि शनि का प्रभाव है तो वे आपको सफलता तनिक विलम्ब से देंगे। प्रतिकूल स्थिति यहां तक हो सकती है कि आप अपने भाग्य को ही कोसने लगें। इन सब के बावजूद भी ठीक उसी कार्यक्षेत्र में शनिदेव आपको स्थापित भी कर देंगे। इसके विपरीत यदि दूसरे पाप ग्रहों का प्रभाव ज्यादा हो तो वे आपके कार्य क्षेत्र में ऐसा वातावरण निर्मित करेंगे कि कार्य का बंटाधार हुआ समझो। इसलिए शनि के संबंध में कोई मिथ्या धारणा नहीं रखनी चाहिए।
न्यायाधीश है शनि
शनि सच्चा न्यायाधीश है। शास्त्रों में इसे न्यायप्रिय भी कहा गया है। मनुष्य के पूर्व जन्मों के शुभाशुभ कर्मों के फल उसे शनि की अन्तरदशा या महादशा में ही प्राप्त होते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि शनि सर्वप्रथम मनुष्य को उसके कुकर्मों की सजा देंगे। इसलिये प्रायः यह देखा जाता है कि शनि की विंशोत्तरी महादशा के शुरूआती वर्ष बहुत ही कष्टप्रद व्यतीत होते हैं। चारों तरफ अंधेरा ही नजर आता है। मित्र शत्रुवत् व्यवहार करते हैं। परिजन दूरी बनाए रखने का प्रयास करते हैं। व्यक्ति दर-दर की ठोकरे खाने को विवश हो सकता है। व्यापार-नौकरी में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इस स्थिति में यह जरूरी है कि व्यक्ति नैतिकता का पूर्णतः पालन करे। झूठ बोलने से हमेशा बचे और सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि अपने इष्ट पर विश्वास बनाए रखे। निश्चित रहें कि जैसे ही आपके पुण्य उदय होंगे तत्काल स्थिति में सुधार होगा। पूर्व जन्मों के पाप नष्ट होते ही शनि आपको एक पल का भी कष्ट नहीं देगा। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है।
शनि की साढेसाती
जिन लोगों को शनि की विंशोत्तरी दशा नहीं आती है उन्हें अपने पाप-पुण्य का हिसाब शनि की साढे साती में देना होता है। यह साढेसाती क्या है? प्रत्येक ग्रह एक निश्चित गति से राशि चक्र का भ्रमण करता है। भचक्र में बारह राशियाँ हैं और सम्पूर्ण भचक्र 320 अंशों में विभक्त है। इस प्रकार प्रत्येक राशि में 30 अंश होते हैं। इन तीस अंशों के भोगने के समय को ही राशि भोगना कहते हैं। लेकिन सभी ग्रहों की गति एक जैसी नहीं है। कोई ग्रह तीव्र गतिशील है तो कोई मंद। उदाहरण के लिए देखें कि चन्द्रमा एक राशि को भोगने में मात्र 56 घंटों का समय ही लेता है। वहीं शनि अपनी जगतप्रसिद्ध मंदता के कारण एक राशि को भोगने में तीस माह का दीर्घ समय लेता है। इसी प्रकार से दूसरे ग्रह भी कम या ज्यादा समय में राशि भ्रमण करते हैं।
चन्द्रमा मन का कारक है और द्वितीय लग्न कहा गया है। चन्द्रमा को सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रह कहा जाता है। अतः माना जाता है कि चन्द्रमा से बारहवें या द्वितीय भी कोई पाप ग्रह हो तो वह जातक के मन मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव डालता है। व्यक्ति की दिनचर्या अस्त-व्यस्त होकर बिखर जाती है। चन्द्रमा अर्थात मन पर पाप प्रभाव होने से वह आत्मघाती निर्णय लेता है जिससे सामान्य सी समस्याएँ पहाड़ बन जाती हैं।
शनि प्रबल पाप ग्रह है अतः जब वह चन्द्रमा से द्वादश, चन्द्रमा के साथ या चन्द्रमा की राशि से द्वितीय होता है तो वह चन्द्रमा को पूरी तरह से प्रभावित करता है। इस काल खण्ड को साढेसाती कहते हैं। साढेसाती इस लिए, क्योंकि शनि एक राशि में 30 माह रहते हुए तीन राशियों में 90 माह रहते हैं। 90 माह अर्थात 7 वर्ष 6 मास, यानि साढे सात वर्ष। इस प्रकार साढे सात वर्ष का अपभ्रंश रूप ही साढेसाती है।
एक व्यक्ति जो सकारात्मक सोच रखता है और अपने काम के प्रति ईमानदार है, साढेसाती के प्रति उसका नजरिया उस व्यक्ति से सर्वदा भिन्न होगा जो भाग्यवादी और आरामपसन्द है। इसी प्रकार से जो व्यक्ति छौटी छौटी बातों को बढा चढा कर प्रदर्शित करता है वह साढेसाती के संबंध में नकारात्मक सोच रखेगा। और जो व्यक्ति अपनी समस्याओं और खुशियों को पचा सकता है। दूसरों की नजर में ऐसा व्यक्ति कभी भी साढेसाती से ग्रस्त नहीं दिखाई देगा।
शनि की साढेसाती सभी पर समान रूप से असर डालती है। इतिहास गवाह है कि लम्बेचैड़े सम्राज्यों के स्वामी भी शनि की साढेसाती के आगे नतमस्तक हुए हैं। जो लोग धनी या आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह से समृद्ध होते हैं उन्हें आर्थिक मामलों में ज्यादा कठिनाई नहीं आती है। यदि ऐसा कुछ होता भी है तो बाहरी आडम्बर के कारण आम आदमी को इसका आभास नहीं हो पाता है। लेकिन शनि की साढेसाती जातक को जितना आर्थिक दृष्टि से प्रभावित करती है उतना ही मानसिक परेशानियाँ भी लाती हैं। इस लिए जो लोग आर्थिक रूप से सुदृढ हैं वे धन की कठिनाई न भी अनुभव करें तो भी पारिवारिक कलह, शारीरिक परेशानी और मान-सम्मान में कमी अवश्य ही अनुभव करते हैं। समाज में उच्चवर्ग और निचले तबके के लोग दोनों ही इस प्रकार की समस्याओं से रू-ब-रू होते हैं।
क्या उपाय करें
जैसा कि मैं बता आया हूं कि शनि की साढेसाती हो या विंशोत्तरी दशा दोनों ही स्थितियों में नैतिकता को बनाए रखना और अपने इष्ट का ध्यान करना, सबसे अच्छे उपाय हैं। दूसरे उपायों में गो-सेवा करना बहुत ही श्रेष्ठ है। देखा जाता है कि गो-सेवा करने से पाप या तो नष्ट हो जाते हैं या उनके दुष्फल स्थगित हो जाते हैं। श्रमिकों और विकलांगों की जरूरी आवश्यकताएं पूर्ण करना बहुत अच्छा निवारण है। नित्य धर्मरत रह कर भैंस का दान देना शनि की प्रसन्नता के लिए उत्तम कहा गया है।
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- वास्तु-शास्त्री सत्यनारायण जांगिड़
विदुर जी के मंदिर के पास। रतनगढ़। राजस्थान।